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Modi Ji ki Gir Rahi hai Shakh ya Arkshan hai Har ka Karan

सभी राजनैतिक दलों का जाती आधारित राजनीत के प्रेम तो है

ही परन्तु भाजापा को कुछ अत्यधिक ही है, भाजपा को जाति आधारित आरक्षण अगले दस साल के लिए आगे बढ़ने पर बहुत खुश होने वाले मोदी जी आज बहुत उदास हैं। ओबीसी का आरक्षण और बढ़ाने का वायदा करने वाले रघुवरदास विलाप कर रहे हैं।

भाजपा के लिए काम करने वाले चैनल समझा रहे हैं कि 21 महीने में 5 राज्यों में सत्ता गंवाने की जिम्मेदारी वहाँ के मुख्यमंत्रियों की है न कि मोदी जी की क्योंकि मोदी जी को तो थोड़े दिन पहले ही प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ था।  शर्मा नाम के चर्चित पत्रकार जनता की प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कल कह रहे थे कि भारत की जनता का कहना है कि –  मोदी जी से वैर नहीं। सीएम तेरी खैर नहीं।

ravindra jatheriपूरी तरह से समाप्त हो चुके विपक्ष

के बीच से हाल ही में दक्षिण कोरिया से भ्रमण स लौटे राहुल गांधी की आवाज में झारखंड विजय ने शेर की आवाज की बुलंदी पैदा कर दी है और वे अति उत्साह से CAA का विरोध करते हुए मोदी जी को देश तोड़ने वाला और अपने को देश जोड़ने वाला सिद्ध करने की कोशिश में लगे हैं।

राजनीति में ऐसा ही होता है। जो जीत जाता है वो अपने को सर्व भौम सम्राट होने का मुगालता पाल लेता है जो हार जाता है वो खामखां ही दिखावे के लिए बाजू ठोंकता है और अपने को अभी तो मैं जवान हूँ कहकर तसल्ली देता दिखाई देता है। मोदी जी वाजपेयी जी के वारिस हैं इसलिए काव्यात्मक लहजे में कह रहे हैं-  हार में ना जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं।।

किन्तु इन सभी दिखावों के बीच बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही नोटा शक्ति का संज्ञान जानबूझकर लेने से बचते हैं, जो बीजेपी की हार और कांग्रेस का एक बड़ा फैक्टर है।

2019 का चुनाव निश्चित ही बीजेपी ही हार जाती

यदि उसके नसीब से पुलबामा कांड न हो जाता जिसने उसे बालाकोट में बदला लेकर भाजपा से रुष्ट भारतीयों को देशभक्ति के इंजेक्शन द्वारा अपने पक्ष में मोड़ लेने का मौका दे दिया। 2019 के चुनाव मोदी के 5 साल के सुशासन के नहीं वल्कि बालाकोट वाले एयर सर्जिकल स्ट्राइक के परिणाम थे जिसे मोदी की सेना के शौर्य नाम से प्रचारित किया गया था और जनता भावनाओं में बह गई थी।

किन्तु अब जनता समझ गई है और देशभक्ति के इंजेक्शन से अब उसमें उबाल नहीं आता है अन्यथा 370 और 35A को हटाने को अपनी महाउपलब्धि प्रचारित करने के बाबजूद बीजेपी की हरियाणा और महाराष्ट्र में छीछालेदर नहीं होती और न ही CAA के कानून बनने के बाद झारखण्ड में सूपड़ा साफ वाली हालत होती।

बिहार की राजनातिक दशा

बिहार को भी एनडीए के हाथों से फिसला हुआ ही मानिये। नीतीश कुमार के अहंकार ने सवर्णों को बहुत जलील किया है। सवर्णों की बेरुखी और तेजस्वी के हमले नीतीश को कब तक खड़ा रहने देंगे देखना दिलचस्प होगा। दिल्ली में भी कमल का सुप्रभात नजर नहीं आ रहा है। यूपी में बाबा जी बलात्कार और ब्राह्मणों की हत्याएं रोकने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। दलितों की खुशामद और दलितों को पुजारियों के रूप में नियुक्ति आदि चोंचले दलितों को कितना खुश कर पायेंगे ये तो चुनाव बताएगा लेकिन सवर्णों का रोष और मुसलमानों की चिढ़ यूपी का सिंघासन अवश्य हिलाएगा।

भाजपा के कार्यकर्ताओ की पार्टी द्वारा उपेक्षा

अभी भी बीजेपी यदि दलबदलुओं को टिकिट देकर अनुग्रहीत और अपने पुराने नेताओं व कार्यकर्ताओं को उपेक्षित करती रही और दलितों व मुस्लिमों को रेवड़ियां व अपने कोर वोटर सवर्णों की ऐसी ही उपेक्षा करती रही तो नोटा की कही ना जा सकने वाली मार से बीजेपी की दुर्गति अवश्य हो जाएगी।

बीजेपी को यदि सद्बुद्धि आ जाय और मोदी जी अपनी सवर्ण से बैकवर्ड और अब अतिपिछड़े बनने की नौटंकी त्यागकर पुरानी फॉर्म में आ जाएं और जिस तुष्टिकरण के नाम पर भाजपा हमेशा कांग्रेस को कोसती रही और जिसे खुद अटल जी व मोदी जी ने उससे अधिक किया वह भीम मीम का गठबंधन बनाकर दिग्विजयी होने का स्वप्न त्यागकर वास्तविकता के धरातल पर आ जाएं और अपने कोर वोटर को नोटा त्यागने पर राजी कर सकें तो हो सकता है कल्याण हो जाय।अन्यथा ये भाजपा की भारतीय राजनीति में अंतिम पारी भी साबित हो सकती है।

जनरल का भाजपा से मोहभंग

मुसलमान और दलित भाजपा के वारे में क्या सोचते हैं वो तो वही जाने लेकिन सवर्ण भाजपा को अब श्रद्धा से नहीं मजबूरी में सपोर्ट कर रहे हैं क्योंकि वे कांग्रेस के विरोधी हैं किंतु उनमे भी बहुतेरे नोटा पकड़कर भाजपा के भी विरोधी बन चुके हैं।ईश्वर मोदी जी को बहादुरशाह जफर की तरह अंतिम भाजपाई प्रधानमंत्री होने से बचाये।

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