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Dilli ki Jeet Kiske Nam Aap ke ya Aap ke Shahin Bag ke

दिल्ली की जीत किसके नाम आप के या आप के शाहीनबाग के या हिन्दू के या मुसलमान के आखिर इस जीत और हार के वास्तविक कारण क्या है? आइये डालते है एक नजर:

दिल्ली चुनाव परिणाम ने

एक मिशाल तय किया देश के लिए की अब भारत की राजनीति मूलभूत जरूरतों पर ही करनी पड़ेगी धर्म और जातिय तुस्टीकरण की राजनीती अब देश के राजनीतिज्ञों को भूल जान चाहिए इसके लिए दिल्ली की जनता बधाई की पात्र है।

देश की जनता खासकर दिल्ली की जनता राजनीती की वास्तविकता को जानती और समझती है शाहीनबाग़ की सरंचना क्यों खड़ा किया गया किसने खड़ा किया और किस किस ने इसे दूर और पास से समर्थन किया जग जाहिर हो चुका है 6% वोट शेयर कैसे बढे तीन सीट से आठ और मुस्लिम बाहुल्य व रिजर्व सीटें जहाँ आप पार्टी ने बाज़ी मारी और 62 सीट हासिल करने तक  तक क्या क्या खेल हुए, दिल्ली की जनता को ही पूरे देश को खूब पता है।

शाहीनबाग़ के विरोध कोshahin bag current to manish sisodia

जनता भले ही चुनावी न माने लेकिन पक्ष और विपक्ष के राजनीतिज्ञों ने इसे चुनावी हथियार के रूप में प्रयोग किया अब ये बात अलग है की ये हथियार किसी के लिए उल्टा पड़ा और किसी के लिए सीधा किसी को फायदा दे गया और किसी को नुकसान।

केजरीवाल ने शाहीनबाग के इस मुद्दे से दूरी बनाए रखने की पूरी कोशिश की और चुनाव के मुद्दे को विकास पर सीमित रखा लेकिन मनीष सिशोदिया को इस मुद्दे से करीबी बहुत महँगी पड़ी मात्र 3207 के अल्पमत से किसी प्रकार जीत पायें, ये तो लगभग वैसा ही हुआ जैसे भाजपा के वित्तमंत्री जी हार गए थे।

वो सीटें जहाँ मुश्लिम वोटर निर्णायक रहें-amit shah shahin bag current

1.ओखला- 40%, 2.सीलमपुर-35%, 3.मटियामहल-40%, 4.बल्लीमारान-50-70%, 5.मुस्तफाबाद-30-40% 6.बाबरपुर-40% 7.चांदनीचौक-40%     —– इन सभी सीटों पर आप पार्टी ने जीत दर्ज की।

शाहीन बाग़ के करंट की चपेट में आये सभी सुरक्षित सीट

लेकिन देखने वाली बात ये है की CAA के विरोध का बहुत बड़ा इम्पैक्ट इन रिजर्व सीटों पड़ा और सीटें भाजपा के हाथ से निकल गयी, CAA के खिलाफ प्रदर्शन ने मुश्लिम वोटरों को केंद्रीभूत किया लेकिन हिन्दू वोटरों को ध्रुवीकरण नहीं कर पाया।

जिन जिन रिजर्व सीटों पर भाजपा को जीत की भारी संभावना थी वहां भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा ScstAct का पुनर संशोधन भी काम नहीं आया, आरक्षण का फिर से नवीनी करण भी कुछ काम नहीं कर सका।

शाहीनबाग़ से आ रहे करंट का पूरा उजाला सुरक्षित सीटों पर AAP पार्टी को मिला

1.त्रिलोकपुरी 2.सीमापुरी 3.पटेलनगर 4.मंगोलपुरी 5.मादीपुर 6.कोंडली 7.करोलबाग 8.देवली 9.अम्बेडकर नगर 10.गोकलपुर 11.बवाना 12.सुल्तानपुर माज़रा. —-इनमें

से एक सुरक्षित सीट पर भाजपा खाता भी नहीं खोल पायी।

सवर्ण समुदाय के वोटरों ने शाहीन बाग़ से बनायी दूरी

इसका कारण सवर्ण वोटरों की नाराजगी थी, सवर्ण वोटरों की नाराजगी ने CAA/शाहीनबाग़  के समर्थन या खिलाफत से

manoj tiwari ye twitte save kar ke rakh lo

अपने को अलग रखा हालाकि प्रयास तो बहुत हुए की जनरल कैटेगरी को इसके जाल में उलझाया जाये लेकिन सवर्ण समुदाय की अति सतर्कता ने उन्हें इस जाल से बचा लिया।

सवर्ण आन्दोलन का भी पड़ा प्रभाव

लगातार 2 महीने से रविन्द्र जठेरी जी का आमरण अनसन भी इस चुनाव को प्रभावित करने वाला एक कारण और रहा सवर्ण समुदाय की बात सुनकर भी जिस तरह से सरकार अनसुना कर रही थी और भारतीय मिडिया जिस तरह से सवर्ण समुदाय की बातों को नजरअंदाज करती रही इससे सवर्णों में एक हताशा की लहर दौड़ रही है और उन निराश सवर्ण समुदाय में से कुछ लोग जो NOTA पर नहीं गएँ उन्होंने भाजपा के विरोधी आप पार्टी को वोट दिया।

सवर्णों को भा गयी ये बात

सवर्ण समुदाय को केजरीवाल की एक ही बात अच्छी लगी AAP सरकार ने अपनी सभी योजनायें जातीय भेदभाव के बिना लागू की और जातिय मकड़जाल में उलझने से स्वयं को बचाते भी रहे और भारतीय जनता पार्टी का जातिय तुष्टीकरण जो सवर्ण समुदाय को भाजपा से दूर करता जा रहा है।nota

सवर्णों की प्रिय पार्टी रही भाजपा

बता दे की यही सवर्ण समुदाय भाजपा का कोर वोटर रहा है जो एक्ट संशोधन के बाद से धीरे धीरे भाजपा से निराश हो कर एनी विकल्प की तलाश कर रहा है और जिन्हें विकल्प नहीं मिल रहा है अगर भाजपा अपने कोर वोटरों का ध्यान रखती तो जितना ध्रुवीकरण मुश्लिमों का हुआ उससे दस गुना ध्रुवीकर्ण हिन्दुओ का होता और आज स्थिति कुछ और होती और 0.46% NOTA के वोट पड़ें है वो भी भाजपा में जाते बता दें की बहुत से ऐसे सीटें रहीं जहाँ हार जित का अंतर लगभग 1000 वोटों के आस पास रहा है।

सार:

कुल मिलकर ये समय वैचारिक रूप से राजनैतिक संक्रांति का चल रहा है जनता चाहती है की सभी प्रकार के तुस्टीकरण बंद हो भ्रष्टाचार अपराध पर लगाम लगे और न्याय वास्तविक रूप से सामाजिक हो हर वर्ग, हर धर्म, हर समुदाय, हर जाति को सम्मान मिले, देश का विकास हो, जो लोग खा पी के मोटे हुए है सिर्फ उन्हें ही पोषण ना मिल कर सभी का भेद भाव रहित पोषण हो जिसमें पूरी तरह तो नहीं लेकिन आंशिक तौर पर ही अरविन्द केजरीवाल सफल हुए।

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